संसदीय कार्यवाही के साधन

प्रश्नकाल :-

  • संसद का पहला घंटा प्रश्नकाल का होता है। इस दौरान सदस्य प्रश्न पूछते हैं एवं मंत्री उत्तर देते हैं। 
  • प्रश्नकाल का उल्लेख प्रक्रिया नियमों में नहीं है। प्रश्न तीन प्रकार के होते हैं :-
    1. तारांकित प्रश्न - इन प्रश्नों के उत्तर मौखिक दिया जाता है तथा इसके बाद पूरक प्रश्न पूछे जाते हैं।
    2. अतारांकित प्रश्न - इस तरह के प्रश्नों के मामलों में लिखित रिपोर्ट आवश्यक होती है और इसके बाद पूरक प्रश्न नहीं पूछे जाते।
    3. अल्प सूचना के प्रश्न - ये ऐसे प्रश्न हैं जिन्हें कम से कम 10 दिन का नोटिस देकर पुछा जाता है। इनका उत्तर भी मौखिक दिया जाता है।

शून्यकाल :-

  • शून्यकाल प्रश्नकाल के तुरंत बाद शुरू होता है इसमें संसद सदस्य बिना पूर्व सूचना के प्रश्न उठा सकते हैं। संसदीय प्रक्रिया में शून्यकाल भारत की दें है और यह 1962 से जारी है। 

प्रस्ताव :-

सदस्यों द्वारा चर्चा के लिए लाये गए प्रस्तावों की तीन प्रमुख श्रेणियां हैं :-
  • महत्वपूर्ण प्रस्ताव - यह स्वयं वर्णित स्वतंत्र प्रस्ताव है जिसके तहत बहुत महत्वपूर्ण मामले आते हैं जैसे - राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाना आदि शामिल हैं। 
  • स्थानापन्न प्रस्ताव - यह वह प्रस्ताव है जो मूल प्रस्ताव का स्थान लेता है। यदि सदन इसे स्वीकार कर लेता है तब मूल प्रस्ताव स्थगित हो जाता है। 
  • पूरक प्रस्ताव - पूरक प्रस्ताव तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक इसके मूल प्रस्ताव का सन्दर्भ न हो।  इसकी तीन श्रेणियां हैं -
    1. सहायक प्रस्ताव - इसे नियमित प्रक्रिया के रूप में विभिन्न कार्यों के संपादन में उपयोग किया जाता है।
    2. स्थान लेने वाला प्रस्ताव - वाद-विवाद के दौरान किसी अन्य मामले के संबंध में लाया जाता है और यह उस मामले का स्थान लेने के लिए लाया जाता है।
    3. मूल प्रस्ताव के केवल भाग को परिवर्तित या स्थान लेने के लिए लाया जाने वाला प्रस्ताव।

कटौती प्रस्ताव :-

यह प्रस्ताव किसी सदस्य द्वारा वाद-विवाद को समाप्त करने के लिए लाया जाता है। यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है तब वाद-विवाद रोककर मतदान के लिए रखा जाता है। चार प्रकार के कटौती प्रस्ताव होते हैं -
  • साधारण कटौती - यह वह प्रस्ताव है जिसे किसी सदस्य की और से रखा जाता है कि इस मामले में पर्याप्त चर्चा हो चुकी है, अब इसे मतदान के लिए रखा जाए। 
  • घटकों में कटौती - ऐसे प्रस्ताव में चर्चा से पूर्व विधेयकों का एक समूह बना लिया जाता है एवं वाद-विवाद में इस भाग पर पूर्ण रूप से चर्चा कि जाती है और सम्पूर्ण भाग को मतदान के लिए रखा जाता है। 
  • कंगारू कटौती - इस प्रस्ताव में केवल महत्वपूर्ण खण्डों पर ही बहस और मतदान होता है और शेष खण्डों को छोड़ दिया जाता है एवं उनको पारित मान लिया जाता है। 
  • गिलोटिन प्रस्ताव - जब किसी विधेयक या संकल्प के किसी भाग पर चर्चा नहीं हो पाती तो उस पर मतदान से पूर्व चर्चा कराने के लिए इस प्रकार का प्रस्ताव रखा जाता है। 

विशेषाधिकार प्रस्ताव :-

  • यह प्रस्ताव किसी मंत्री द्वारा संसदीय विशेषाधिकारों के उल्लंघन से सम्बंधित है। यह किसी सदस्य द्वारा पेश किया जाता है, जब सदस्य को लगता हो कि सही तथ्यों को प्रकट नहीं कर या गलत सूचना देकर किसी मंत्री ने सदन या सदन के एक या अधिक सदस्यों के विशेषाधिकार का उल्लंघन किया गया है।  इस प्रस्ताव का उद्देश्य संबंधित मंत्री कि निंदा करना है। 

ध्यानाकर्षण प्रस्ताव :-

  • इस प्रस्ताव के माध्यम से सदन का कोई सदस्य सदन के पीठासीन अधिकारी कि अग्रिम अनुमति से किसी मंत्री का ध्यान अविलंबनीय लोक महत्व के किसी मामले पर आकृष्ट कर सकता है। 
  • संसदीय प्रक्रिया में यह भारतीय नवाचार है एवं 1954 से चल रहा है। संसदीय प्रक्रिया नियमों में इसका वर्णन किया गया है। 

स्थगन प्रस्ताव :-

  • यह अविलंबनीय लोक महत्व के मामले पर सदन में चर्चा के लिए सदन की कार्यवाही को स्थगित करने का प्रस्ताव है। इसके लिए 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है। 
  • स्थगन प्रस्ताव को लोकसभा एवं राज्यसभा दोनों में पेश किया जा सकता है। एवं सदन का कोई भी सदस्य प्रस्ताव को पेश कर सकता है। 
  • स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा ढाई घंटे से काम की नहीं होती है। 
  • स्थगन प्रस्ताव की सीमायें :-
    1. इसके माध्यम से ऐसे मुद्दों को उठाया जा सकता है जो अत्यंत जरुरी एवं लोक महत्व के हों।
    2. इसमें एक से अधिक मुद्दों को शामिल नहीं क्या जा सकता है।
    3. इसके माध्यम से वर्तमान घटनाओं के महत्वपूर्ण विषय को ही उठाया जा सकता है।
    4. इसके माध्यम से विशेषाधिकार के प्रश्न को नहीं उठाया जा सकता है।
    5. इसके माध्यम से ऐसे किसी विषय पर चर्चा नहीं की जा सकती जिस पर उसी सत्र में चर्चा हो चुकी है।
    6. इसके माध्यम से ऐसे विषय पर भी चर्चा नहीं हो सकती जो न्यायालय में विचाराधीन है।
    7. किसी पृथक प्रस्ताव के माध्यम से उठाये गए विषयों को पुनः उठाने की अनुमति नहीं होगी।

अविश्वास प्रस्ताव :-

  • संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी। लोकसभा मंत्रिमंडल को अविश्वास प्रस्ताव पारित कर हटा सकती है। इस प्रस्ताव के समर्थन में 50 सदस्यों का समर्थन अनिवार्य है। 

निंदा प्रस्ताव :-

  • निंदा प्रस्ताव अविश्वास प्रस्ताव से अलग है। यह मंत्रिपरिषद की कुछ नीतियों या कार्य के खिलाफ निंदा के लिए लाया जाता है। 
  • निंदा प्रस्ताव किसी एक मंत्री या मंत्रियों के समूह या पूरे मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जा सकता है। 
  • यदि निंदा प्रस्ताव लोकसभा में पारित हो जाये तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं है। 

धन्यवाद् प्रस्ताव :-

  • प्रत्येक आम चुनाव के पहले सत्र तथा वित्तीय वर्ष के पहले सत्र में राष्ट्रपति सदन को सम्बोधित करता है। अपने सम्बोधन में राष्ट्रपति पिछले वर्ष एवं आने वाले वर्ष में सरकार की नीतियों का खाका खींचता है एवं इसकी दोनों सदनों में चर्चा होती है। इसी को धन्यवाद प्रस्ताव कहते हैं। 
  • बहस के बाद प्रस्ताव को मत विभाजन के लिए रखा जाता है। प्रस्ताव को सदन में पारित होना आवश्यक है अन्यथा माना जाता है कि सरकार पराजित हो गयी है। 

अनियत दिवस :-

  • यह ऐसा प्रस्ताव है जिसे अध्यक्ष चर्चा के लिए बिना तिथि निर्धारित किये रखता है। 
  • अध्यक्ष सदन के नेता से चर्चा करके या सदन कि कार्य मंत्रणा समिति कि अनुशंसा से इस प्रकार के प्रस्ताव के लिए कोई दिन या समय नियत करता है। 

औचित्य प्रश्न :-

  • जब सदन, संचालन के सामान्य नियमों का पालन नहीं करता है तो एक सदस्य औचित्य प्रश्न के माध्यम से सदन का ध्यान आकर्षित कर सकता है। 
  • सामान्यतः विपक्षी सदस्य द्वारा सरकार पर नियंत्रण के लिए औचित्य प्रश्न उठाया जाता है। 
  • औचित्य प्रश्न में किसी तरह कि बहस कि अनुमति नहीं होती है। 

आधे घंटे की बहस :-

  • आधे घंटे की बहस लोक महत्व के मामलों आदि पर चर्चा के लिए होती है। 
  • अध्यक्ष ऐसी बहस के लिए सप्ताह में तीन दिन निर्धारित कर सकता है, इसके लिए सदन में प्रस्ताव या मतदान नहीं होता है। 

अल्पकालिक चर्चा :-

  • अल्पकालिक चर्चा को दो घंटे की चर्चा भी कहते हैं क्यूंकि इस तरह की चर्चा के लिए दो घंटे से अधिक का समय नहीं लगता है। 
  • संसद सदस्य लोक महत्व के मामले को बहस के लिए रख सकते हैं। 
  • अध्यक्ष एक सप्ताह में इस पर बहस के लिए तीन दिन उपलब्ध करा सकता है।