राज्यसभा की संरचना

राज्यसभा की संरचना :- 

  • राज्यसभा में अधिकतम 250 सदस्यों का प्रावधान किया गया है। इनमें से 238 सदस्य राज्य एवं संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किये जाते हैं।
  • संविधान की चौथी अनुसूची में राज्य एवं संघ राज्य क्षेत्रों के लिए सीटों के आबंटन का वर्णन किया गया है।

राज्यसभा की अवधि:-

  • राज्यसभा पहली बार 1952 में स्थापित हुयी तब से निरंतर चल रही है, यह स्थायी सदन है जो कि विघटित नहीं होता एवं इसके एक तिहाई सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते है। एवं खाली सीटें फिर चुना द्वारा भरी जाती है। 
  • राज्यसभा से सेवानिवृत्त होने वाले सदस्य जितनी बार चाहें चुनाव लड़ सकते हैं एवं नामित हो सकते है। 
  • संविधान में राज्यसभा के सदस्यों के लिए पदावधि का निर्धारण नहीं किया गया था एवं संसद पर छोड़ दिया गया था। तब संसद ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के आधार पर कहा कि सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होना चाहिए।  

राज्यसभा के प्रतिनिधियों की  निर्वाचन व्यवस्था :-

  • राज्यसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व:- राज्यसभा में राज्यों के प्रतिनिधियों का निर्वाचन राज्य विधानसभा  के निर्वाचित सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा करते हैं। राज्यसभा के लिए राज्यों की सीटों का बंटवारा उनकी जनसँख्या के आधार पर किया जाता है। इसलिए अलग अलग राज्यों में प्रतिनिधियों की संख्या राज्यसभा के लिए अलग है।
  • राज्यसभा में संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व:- राज्यसभा में संघ राज्य क्षेत्र से जाने वाले प्रतिनिधि का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। एवं यह चुनाव भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा किया जाता है। संघ राज्य क्षेत्रों में केवल दिल्ली एवं पुदुचेरी के प्रतिनिधि ही अभी राज्यसभा में हैं।
  • राज्यसभा के लिए नामित सदस्य:- राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति ऐसे 12 सदस्यों को नामित करता है जिन्हें कला, विज्ञान, साहित्य एवं समाज सेवा विषयों के सम्बन्ध में विशेष ज्ञान एवं व्यवहारिक अनुभव हो। ऐसी व्यवस्था इसलिए की गयी है ताकि नामी एवं प्रसिद्ध व्यक्ति बिना चुनाव के राज्यसभा में जा सकें।

राज्यसभा का सभापति :-

  • भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति होता है। लेकिन जब उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कर्तव्य का निर्वहन करता है तब वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता।
  • राज्यसभा के सभापति को तभी पद से हटाया जा सकता है जब उसे उपराष्ट्रपति के पद से हटा दिया जाये।
  • राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी के तौर पर राज्यसभा के सभापति की शक्तियां व कार्य लोकसभा अध्यक्ष के समान होती हैं।
  • राज्यसभा का सभापति सदन का सदस्य नहीं होता तथा राज्यसभा में मत बराबरी होने पर निर्णायक मत दे सकता है।
  • जब उपराष्ट्रपति को सभापति पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन हो तब वह राज्यसभा का पीठासीन अधिकारी नहीं होता है। लेकिन वह सदन में उपस्थित रह सकता है, बोल सकता है एवं सदन की कार्यवाही में भाग ले सकता है परन्तु वह मत नहीं दे सकता।
  • राज्यसभा का सभापति के वेतन भत्ते का निर्धारण संसद करती है एवं यह वेतन, भत्ता संचित निधि से दिया जाता है।
  • जब उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है तब उसे राज्यसभा के सभापति के तौर पर वेतन एवं भत्ता नहीं मिलता। बल्कि राष्ट्रपति को मिलने वाले वेतन भत्ते दिए जाते हैं।

राज्यसभा का उपसभापति :-

  • राज्यसभा अपने सदस्यों के बीच से स्वयं अपना उपसभापति चुनती है।
  • उपसभापति सदन में सभापति का पद खाली होने या सभापति की अनुपस्थिति में सभापति के रूप में कार्य करता है।
  • उपसभापति, सभापति के समान सदन की कार्यवाही के दौरान पहले मत नहीं देता, बराबर वोट पड़ने पर निर्णायक मत दे सकता है।
  • उपसभापति को हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन है तब वह सदन की कार्यवाही में पीठासीन नहीं होता भले ही वह सदन में उपस्थित हो।
  • जब सभापति राज्यसभा की अध्यक्षता करता है तो उपसभापति एक साधारण सदस्य होता है और ऐसी स्थिति में वह सदन की कार्यवाही में भाग ले सकता है, बोल सकता है एवं मतदान की स्थिति में मत भी दे सकता है।
  • उपसभापति के वेतन भत्ते संसद द्वारा निर्धारित होते हैं एवं संचित निधि से दिए जाते हैं।
  • उपसभापति तीन कारणों से पद छोड़ता है-
    1. राज्यसभा से सदस्यता समाप्त होने पर।
    2. सभापति को लिखित इस्तीफ़ा सौंपने पर।
    3. उपसभापति को हटाने का प्रस्ताव बहुमत से पारित हो जाये।
  • उपसभापति को 14 दिनों का पूर्व नोटिस देने के बाद ही हटाने का प्रस्ताव लाया जा सकता है।

राज्यसभा के उपसभापतियों की तालिका :-

  • राज्यसभा के नियमों के अनुसार सभापति राज्यसभा के सदस्यों में से उपसभापतियों को मनोनीत करता है। 
  • जब सभापति एवं उपसभापति सदन में अनुपस्थित हों तब इस तालिका से कोई भी सदस्य सदन की अध्यक्षता कर सकता है एवं उसको सभापति के सामान अधिकार एवं शक्तियां प्राप्त होंगी। 
  • यदि पैनल के सभी सदस्य भी अनुपस्थित हों तब सदन द्वारा निर्धारित सदस्य सदन कि अध्यक्षता करता है। 
  • पैनल का सदस्य सदन कि अध्यक्षता तब भी नहीं करेगा जब सभापति या उपसभापति के पद रिक्त हो।